Tuesday, April 26, 2022

 मैं अपनी तमाम बेचैन बेचैनियों को दबाता फिर रहा हूँ…

गर मैं खुश हूँ, तो मैं खुश हूँ — क्यों ये गाता फिर रहा हूँ…
रखा है एक क़दम बाहर अपनी ही हदें तोड़कर…
हदों को मैं पार कर नई हदें बनाता फिर रहा हूँ…

वो क्या है — कि, मैं डरपोक हूँ…
अपने ही सवालों से परेशान हूँ…
मैं पूछता हूँ ख़ुद से कि किधर जाना है,
कहाँ थम जाना है मुझे, कब बिखर जाना है।
रोशनी, रंग, आवाज़ — सब है मेरे ख़याल में,
मैं ख़यालों में ही महफ़िल सजाता फिर रहा हूँ।

कुछ बात है मुझमें, जो मुझसे ही छिपी है,
अपनी ही बातों का बतंगड़ बनाता फिर रहा हूँ।

मैं हूँ या नहीं हूँ…
मेरा सवाल है मुझसे ही…
मुझे शक़ है ख़ुद के ही वजूद पे,
और ग़ज़ल ज़िंदगी पे बनाता फिर रहा हूँ।

मैं —
आईने में ख़ुद को मैं पहचान नहीं पाता,
तस्वीर औरों की मैं बनाता फिर रहा हूँ।

मेरा ख़ुद पे एक एहसान है,
जो ये पाक मेरा ईमान है।
मैंने पाला ये भरम ज़िंदगी की ख़ातिर,
मैं अब क्या करूँ जो ज़िंदगी ही बेईमान है।
क्या सही, क्या ग़लत है — अब अंदाज़ा ही नहीं इसका मुझे,
आप-बीती को नाइंसाफ़ियाँ मैं, बताता फिर रहा हूँ।

रोशनी पसंद नहीं मुझे,
मगर परछाइयाँ देख मैं खुश होता हूँ।
मुझे प्यार है काली रातों से,

मुझे ख़ुद से कोई भी उम्मीद नहीं।

मैं अपने आप से लड़ रहा हूँ,
छोड़ मैं पीछे ख़ुद को, आप ही बढ़ रहा हूँ।

कभी होगी फ़ुरसत तो मैं सोचूँगा,
कि मैं मग़रूर कहाँ हूँ।
जंग मैं लड़ रहा दुनिया की सच्च की,
पर ख़्वाब मैं अपने झुठलाता फिर रहा हूँ।

मैं बिखरा हूँ, मगर अभी टूटा नहीं हूँ।




No comments: